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2 Line Dua Poetry In Hindi

2 Line Dua Poetry In HIndi

2 Line Dua Poetry In Hindi

2 Line Dua Poetry In Hindi बेहतरीन और चुनिंदा शायरी का संग्रह जो की दुआ शब्द को बहुत ही शानदार तरीके से वर्णित करता है ! दुआ पर हिंदी के ये शेर, आपके प्यार और भावनाओं को वक़्त करने में आपकी मदद कर सकते हैं ! यहाँ आप हर तरह की शायरी को पढ़ सकते है और अपने चाहने वालों को शेरे कर सकते हैं !

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Famous Dua Poetry In Hindi.

Auron ki burai na dekhun wo nazar de,
Haan apni burai ko parakhne ka hunar de.

औरों की बुराई को न देखूँ वो नज़र दे,
हाँ अपनी बुराई को परखने का हुनर दे !

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Main kya karun mere qatil na chahne par bhi,
Tere liye mere dil se dua niklati hai.

मैं क्या करूँ मेरे क़ातिल न चाहने पर भी,
तेरे लिए मेरे दिल से दुआ निकलती है !

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Abhi raah mein kai mod hain koi aayega koi jayega,
Tumein jis ne dil se bhula diya usse bhulne ki dua karo.

अभी राह में कई मोड़ हैं कोई आएगा कोई जायेगा,
तुम्हें जिस ने दिल से भुला दिया उसे भूलने की दुआ करो !

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Aakhir dua karein bhi to kis mudda ke saath,
Kaise zmeen ki baat kahein aasman se hum.

आखिर दुआ करें भी तो किस मुद्दे के साथ,
कैसे ज़मीन की बात कहें आसमान से हम !

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Abhi jinda hai maa meri mujhe kuch bhi nahi hoga,
Main ghar se jab nikalta hun dua bhi saath chalti hain.

अभी ज़िंदा है माँ मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा,
मैं घर से जब निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती हैं !

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Dua ko haath uthate huye larjta hun,
Kabhi dua nahi mangi thi maa ke hote huye.

दुआ को हाथ उठाते हुए लरजता हूँ,
कभी दुआ नहीं मांगी थी माँ के होते हुए !

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Jab bhi kashti meri selaab mein aa jati hai,
Maa dua karti huyi khwaab mein aa jati hai.

जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है,
माँ दुआ करती हुई ख्वाब में आ जाती है !

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Jate ho khuda hafeez haan itni guzarish hai,
Jab yaad hum aa jayein milne ki dua karna.

जाते हो ख़ुदा हाफ़िज़ हाँ इतनी गुज़ारिश है,
जब याद हम आ जाएं मिलने की दुआ करना !

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Kyun mang rahe ho kisi baarish ki duayein,
Tum apne shiksta dar-o-deewar to dekho.

क्यों मांग रहे हो किसी बारिश की दुआएं,
तुम अपने शिकस्ता दर-ओ-दीवार तो देखो !

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Mang lun tujhse tujhi ko ki sabhi kuch mil jaye,
Sau sawalon se yahi ek sawal achcha hai.

मांग लूं तुझसे तुझी को की सभी कुछ मिल जाये,
सौ सवालों से यही एक सवाल अच्छा है !

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Mujhe zindagi ki dua dene wale,
Hansi aa rahi hai teri sadgi par.

मुझे ज़िन्दगी की दुआ देने वाले,
हंसी आ रही है तेरी सादगी पर !

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Koi charaah nahi dua ke siwa,
Koi suna nahi khuda ke siwa.

कोई चराह नहीं दुआ के सिवा,
कोई सुना नहीं खुदा के सिवा !

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Hazar bar jo manga karo kya hasil,
Dua wahi hai jo dil se kabhi nikalti hai.

हज़ार बार जो माँगा करो क्या हासिल,
दुआ वही है जो दिल से कभी निकलती है !

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Dua karo ki ye paudha hara hi lage,
Udasiyon mein bhi chehra khila hi lage.

दुआ करो कि ये पौधा हरा ही लगे,
उदासियों में भी चेहरा खिला ही लगे !

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Dua karo ki main us ke liye dua ho jaun,
Wo ek shakhas jo dil ko dua sa lagta hai.

दुआ करो कि मैं उस के लिए दुआ हो जाऊं,
वो एक शख्स जो दिल को दुआ सा लगता है !

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Mangi thi ek bar dua hum ne maut ki,
Sharminda aaj tak hain miyan zindagi se hum.

मांगी थी एक बार दुआ हम ने मौत की,
शर्मिंदा आज तक हैं मियां ज़िन्दगी से हम !

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Marz-e-ishq jise ho usse kya yaad rahe,
Na dawa yaad rahe aur na dua yaad rahe.

मर्ज़-ए-इश्क़ जिसे हो उससे क्या याद रहे,
न दवा याद रहे और न दुआ याद रहे !

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Maine din raat khuda se ye dua mangi thi,
Koi aahat na ho dar par mere jab tu aaye.

मैंने दिन रात खुदा से ये दुआ मांगी थी,
कोई आहट ना हो दर पर मेरे जब तू आये !

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Dur rahti hain sada un se balayein sahil,
Apne maa-baap ki jo roz dua lete hain.

दूर रहती हैं सदा उन से बलायें साहिल,
अपने माँ-बाप की जो रोज़ दुआ लेते हैं !

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Kisi ne chum ke aankhon ko ye dua di thi,
Zameen teri khuda motiyon se num kar de.

किसी ने चुम के आँखों को ये दुआ दी थी,
ज़मीन तेरी खुदा मोतियों से नुम कर दे !

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Tu salamat raho qayamat tak,
Aur qayamat kabhi na aaye “Shad”.

तू सलामत रहो क़यामत तक,
और क़यामत कभी न आये “शाद” !

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Wo bada rahim o qareem hai mujhe ye sifat bhi ataa kare,
Tujhe bhulne ki dua karun to meri dua mein asar na ho.

वो बड़ा रहीम ओ करीम है मुझे ये सिफ़त भी अता करे,
तुझे भूलने की दुआ करूँ तो मेरी दुआ में असर न हो !

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Ye bastiyan hai ki maqlat dua kiye jaye,
Dua ke din hai musalsal dua kiye jaye.

ये बस्तियां है की मकलत दुआ किये जाये,
दुआ के दिन है मुसलसल दुआ किये जाये !

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Wo sarkhushi de ki zindagi ko sharaab se bahar yaab kar de,
Mere khayalon mein rang bhar mere lahu ko sharaab kar de.

वो सरखुशी दे की ज़िन्दगी को शराब से बाहर याब कर दे,
मेरे ख्यालों में रंग भर मेरे लहू को शराब कर दे !

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Jaban pe shikwa-e-mehri-e-khuda kyun hai,
Dua to mangiye “Aatish” kabhi dua ki tarah.

जबान पे शिकवा-ए-मेहरी-ए-खुदा क्यों है,
दुआ तो मांगिये “आतिश” कभी दुआ की तरह !

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Hijr ki shab nala-e-dil wo sada dene lage,
Sunane wale raat ktne ki dua dene lage.

हिज्र की शब् नाला-ए-दिल वो सदा देने लगे,
सुनने वाले रात कटने की दुआ देने लगे !

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Kya-kya duayein mangte hain sab magar “asar”,
Apni yahi dua hai koi mudda na ho.

क्या-क्या दुआएं मांगते हैं सब मगर “असर”,
अपनी यही दुआ है कोई मुद्दा न हो !

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Sahraa ka safar tha to shajar kyun nahi aaya,
Mangi thi duayein to asar kyun nahi aaya.

सहरा का सफर था तो शजर क्यों नहीं आया,
मांगी थी दुआयें तो असर क्यों नहीं आया !

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Dekh kar tul-e-shab-e-hijr dua karta hun,
Wasl ke roz se bhi umar meri kam ho jaye.

देख कर तूल-ए-शब्-ए-हिज्र दुआ करता हूँ,
वस्ल के रोज़ से भी उम्र मेरी कम हो जाये !

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Raah ka sajar hun main aur ek musafir tu,
De koi dua mujh ko le koi dua mujh se.

राह का सजर हूँ मैं और एक मुसाफिर तू,
दे कोई दुआ मुझ को ले कोई दुआ मुझ से !

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Bhul hi jayein hum ko ye to na ho,
Log mere liye dua na karein.

भूल ही जाएं हम को ये तो न हो,
लोग मेरे लिए दुआ न करें !

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Aate hain barg-o-baar darkhaton ke jism par,
Tum bhi uthao haath ki mausam dua ka hai.

आते हैं बर्ग-ओ-बार दरख़्तों के जिस्म पर,
तुम भी उठाओ हाथ कि मौसम दुआ का है !

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Na charagar ki jrurat na kuch dawa ki hai,
Dua ko haath uthao ki gham ki raat kate.

न चारागर की जरुरत न कुछ दवा की है,
दुआ को हाथ उठाओ की ग़म की रात कटे !

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Dushman-e-jaan hi sahi dost samjata hun usse,
Bad-dua jis ki mujhe ban ke dua lagti hai.

दुश्मन-ए-जाँ ही सही दोस्त समझता हूँ उसे,
बद-दुआ जिस की मुझे बन के दुआ लगती है !

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Kaun deta hai mohabbat ko parstish ka maqam,
Tum ye insaaf se socho to dua do hum ko.

कौन देता है मोहब्बत को परस्तिश का मक़ाम,
तुम ये इन्साफ से सोचो तो दुआ दो हम को !

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Us marz ko marz-e-ishq kaha karte hain,
Na dawa hoti hai jis ki na dua hoti hai.

उस मरज़ को मरज़-ए-इश्क़ कहा करते हैं,
न दवा होती है जिस की न दुआ होती है !

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Zameen ko aye khuda wo jaljala de,
Nishan tak sarhdon ke jo mita de.

ज़मीं को ऐ ख़ुदा वो ज़लज़ला दे,
निशाँ तक सरहदों के जो मिटा दे !

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Ek teri tamana ne kuch yesa nawaza hai,
Mangi hi nahi jati ab koi dua hum se.

एक तेरी तमन्ना ने कुछ ऐसा नवाज़ा है,
माँगी ही नहीं जाती अब कोई दुआ हम से !

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Maut mangi thi khudai to nahi mangi thi,
Le dua kar chuke ab tark-e-dua karte hain.

मौत माँगी थी ख़ुदाई तो नहीं माँगी थी,
ले दुआ कर चुके अब तर्क-ए-दुआ करते हैं !

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Haye koi dawa karo haye koi dua karo,
Haye jigar mein dard hai haye jigar ka kya karun.

हाए कोई दवा करो हाए कोई दुआ करो,
हाए जिगर में दर्द है हाए जिगर का क्या करूँ !

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Us dushman-e-wafa ko dua de raha hun main,
Mera na ho saka wo kisi ka to ho gaya.

उस दुश्मन-ए-वफ़ा को दुआ दे रहा हूँ मैं,
मेरा न हो सका वो किसी का तो हो गया !

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Gham-e-dil ab kisi ke bas ka nahi,
Kya dawa kya dua kare koi.

ग़म-ए-दिल अब किसी के बस का नहीं,
क्या दवा क्या दुआ करे कोई !

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Ye mozja bhi kisi ki dua ka lagta hai
Ye shehar ab bhi usi bewafa ka lagta hai.

ये मोजज़ा भी किसी की दुआ का लगता है,
ये शहर अब भी उसी बे-वफ़ा का लगता है !

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Buland haathon mein zanjir dal dete hain,
Ajib rasm chali hai dua na mange koi.

बुलंद हाथों में जंजीर डाल देते हैं,
अजीब रस्म चली है दुआ ना मांगे कोई !

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Ye iltija dua ye tamana fuzul hai,
Sukhi nadi ke paas samundar na jayega.

ये इल्तिजा दुआ ये तमना फ़ुज़ूल है,
सूखी नदी के पास समुन्दर न जायेगा !

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Koi to phool khilaye dua ke lahze mein,
Ajab trah ki ghutan hai hawa ke lahze mein.

कोई तो फूल खिलाए दुआ के लहज़े में,
अजब तरह की घुटन है हवा के लहज़े में !

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Main zindagi ki dua mangne laga hun bahut,
Jo ho sake to duaon ko be-asar kar de.

मैं ज़िन्दगी की दुआ मांगने लगा हूँ बहुत,
जो हो सके तो दुआओं को बे-असर कर दे !

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Baki hi kya raha tujhe mangne ke baad,
Bas ek dua mein chut gaye dua se hum.

बाकी ही क्या रहा तुझे मांगने के बाद,
बस एक दुआ में छूट गए दुआ से हम !

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Na jane kon si manzil pe ishq aa pahuncha,
Dua bhi kaam na aaye koi dawa na lage.

न जाने कौन सी मंज़िल पे इश्क़ आ पहुंचा,
दुआ भी काम न आये कोई दवा न लगे !

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Manga kareinge ab se dua hijr-e-yaar ki,
Aakhir to dushmani hai asar ko dua ke saath.

माँगा करेंगे अब से दुआ हिज्र-ए-यार की,
आख़िर तो दुश्मनी है असर को दुआ के साथ !

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Duayein yaad kara di gayi thi bachpan mein,
So zakhm khate rahe aur dua diye gaye hum.

दुआएँ याद करा दी गई थीं बचपन में,
सो ज़ख़्म खाते रहे और दुआ दिए गए हम !

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Is liye chal na saka koi bhi khanjar mujh par,
Meri shah-rag pe meri maa ki dua rakkhi thi.

इस लिए चल न सका कोई भी ख़ंजर मुझ पर,
मेरी शह-रग पे मेरी माँ की दुआ रक्खी थी !

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Jab lagen zakhm to qatil ko dua di jaye,
Hai yahi rasm to ye rasm utha di jaye.

जब लगें ज़ख़्म तो क़ातिल को दुआ दी जाए,
है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाए !

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-Dua Shayari / Poetry/ Status / Quotes

 

Jazba-E-Dil Ne Mere Tasir Dikhlai To Hai

Jazba-e-dil ne mere tasir dikhlai to hai,
Ghungruon ki jaanib-e-dar kuch sada aayi to hai.

Ishq ke izhaar mein har-chand ruswai to hai,
Par karun kya ab tabiat aap par aayi to hai.

Aap ke sar ki qasam mere siwa koi nahi,
Be-takalluf aaiye kamre mein tanhai to hai.

Jab kaha main ne tadapta hai bahut ab dil mera,
hans ke farmaya tadapta hoga saudai to hai.

Dekhiye hoti hai kab rahi su-e-mulk-e-adam,
Khana-e-tan se hamari ruh ghabrai to hai.

Dil dhadakta hai mera lun bosa-e-rukh ya na lun,
Nind mein us ne dulai munh se sarkai to hai.

Dekhiye lab tak nahi aati gul-e-ariz ki yaad,
Sair-e-gulshan se tabiat hum ne bahlai to hai.

Main bala mein kyun phansun diwana ban kar us ke sath,
Dil ko wahshat ho to ho kambakht saudai to hai.

Khak mein dil ko milaya jalwa-e-raftar se,
Kyun na ho aye naujawan ek shan-e-ranai to hai.

Yun murawwat se tumhaare samne chup ho rahen,
Kal ke jalson ki magar hum ne khabar pai to hai.

Baada-e-gul-rang ka saghar inayat kar mujhe,
Saqiya takhir kya hai ab ghata chhai to hai.

Jis ki ulfat par bada dawa tha kal “Akbar” tumhein,
Aaj hum ja kar use dekh aaye harjai to hai. !!

जज़्बा-ए-दिल ने मेरे तासीर दिखलाई तो है,
घुंघरूओं की जानिब-ए-दर कुछ सदा आई तो है !

इश्क़ के इज़हार में हर-चंद रुस्वाई तो है,
पर करूँ क्या अब तबीअत आप पर आई तो है !

आप के सर की क़सम मेरे सिवा कोई नहीं,
बे-तकल्लुफ़ आइए कमरे में तन्हाई तो है !

जब कहा मैं ने तड़पता है बहुत अब दिल मेरा,
हंस के फ़रमाया तड़पता होगा सौदाई तो है !

देखिए होती है कब राही सू-ए-मुल्क-ए-अदम,
ख़ाना-ए-तन से हमारी रूह घबराई तो है !

दिल धड़कता है मेरा लूँ बोसा-ए-रुख़ या न लूँ,
नींद में उस ने दुलाई मुँह से सरकाई तो है !

देखिए लब तक नहीं आती गुल-ए-आरिज़ की याद,
सैर-ए-गुलशन से तबीअत हम ने बहलाई तो है !

मैं बला में क्यूँ फँसूँ दीवाना बन कर उस के साथ,
दिल को वहशत हो तो हो कम्बख़्त सौदाई तो है !

ख़ाक में दिल को मिलाया जल्वा-ए-रफ़्तार से,
क्यूँ न हो ऐ नौजवाँ इक शान-ए-रानाई तो है !

यूँ मुरव्वत से तुम्हारे सामने चुप हो रहें,
कल के जलसों की मगर हम ने ख़बर पाई तो है !

बादा-ए-गुल-रंग का साग़र इनायत कर मुझे,
साक़िया ताख़ीर क्या है अब घटा छाई तो है !

जिस की उल्फ़त पर बड़ा दावा था कल “अकबर” तुम्हें,
आज हम जा कर उसे देख आए हरजाई तो है !!

 

Dard To Maujud Hai Dil Mein Dawa Ho Ya Na Ho

Dard to maujud hai dil mein dawa ho ya na ho,
Bandagi haalat se zahir hai khuda ho ya na ho.

Jhumti hai shakh-e-gul khilte hain ghunche dam-ba-dam,
Ba-asar gulshan mein tahrik-e-saba ho ya na ho.

Wajd mein late hain mujh ko bulbulon ke zamzame,
Aap ke nazdik ba-mani sada ho ya na ho.

Kar diya hai zindagi ne bazm-e-hasti mein sharik,
Us ka kuch maqsud koi muddaa ho ya na ho.

Kyun ciwil-surgeon ka aana rokta hai ham-nashin,
Is mein hai ek baat honour ki shifa ho ya na ho.

Maulwi sahib na chhodenge khuda go bakhsh de,
Gher hi lenge police wale saza ho ya na ho.

Membari se aap par to warnish ho jayegi,
Qaum ki haalat mein kuch is se jila ho ya na ho.

Motariz kyun ho agar samjhe tumhein sayyaad dil,
Aaise gesu hun to shubah dam ka ho ya na ho. !!

दर्द तो मौजूद है दिल में दवा हो या न हो,
बंदगी हालत से ज़ाहिर है ख़ुदा हो या न हो !

झूमती है शाख़-ए-गुल खिलते हैं ग़ुंचे दम-ब-दम,
बा-असर गुलशन में तहरीक-ए-सबा हो या न हो !

वज्द में लाते हैं मुझ को बुलबुलों के ज़मज़मे,
आप के नज़दीक बा-मअनी सदा हो या न हो !

कर दिया है ज़िंदगी ने बज़्म-ए-हस्ती में शरीक,
उस का कुछ मक़्सूद कोई मुद्दआ हो या न हो !

क्यूँ सिवल-सर्जन का आना रोकता है हम-नशीं,
इस में है इक बात ऑनर की शिफ़ा हो या न हो !

मौलवी साहिब न छोड़ेंगे ख़ुदा गो बख़्श दे,
घेर ही लेंगे पुलिस वाले सज़ा हो या न हो !

मिमबरी से आप पर तो वार्निश हो जाएगी,
क़ौम की हालत में कुछ इस से जिला हो या न हो !

मोतरिज़ क्यूँ हो अगर समझे तुम्हें सय्याद दिल,
ऐसे गेसू हूँ तो शुबह दाम का हो या न हो !!

-Akbar Allahabadi Ghazal / Urdu Poetry

 

Dil-E-Nadan Tujhe Hua Kya Hai..

Dil-e-nadan tujhe hua kya hai

 

Dil-e-nadan tujhe hua kya hai,
Aakhir is dard ki dawa kya hai.

Hum hain mushtaq aur wo bezar,
Ya ilahi ye majra kya hai.

Main bhi munh mein zaban rakhta hun,
Kash puchho ki muddaa kya hai.

Jab ki tujh bin nahi koi maujud,
Phir ye hangama aye khuda kya hai.

Ye pari chehra log kaise hain,
Ghamza o ishwa o ada kya hai.

Shikan-e-zulf-e-ambarin kyun hai,
Nigah-e-chashm-e-surma sa kya hai.

Sabza o gul kahan se aaye hain,
Abr kya chiz hai hawa kya hai.

Hum ko un se wafa ki hai ummid,
Jo nahi jaante wafa kya hai.

Han bhala kar tera bhala hoga,
Aur darwesh ki sada kya hai.

Jaan tum par nisar karta hun,
Main nahi jaanta dua kya hai.

Main ne mana ki kuch nahi “Ghalib
Muft hath aaye to bura kya hai. !!

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है,
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है !

हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार,
या इलाही ये माजरा क्या है !

मैं भी मुँह में ज़बान रखता हूँ,
काश पूछो कि मुद्दा क्या है !

जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद,
फिर ये हंगामा ऐ ख़ुदा क्या है !

ये परी-चेहरा लोग कैसे हैं,
ग़म्ज़ा ओ इश्वा ओ अदा क्या है !

शिकन-ए-ज़ुल्फ़-ए-अंबरीं क्यूँ है,
निगह-ए-चश्म-ए-सुरमा सा क्या है !

सब्ज़ा ओ गुल कहाँ से आए हैं,
अब्र क्या चीज़ है हवा क्या है !

हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद,
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है !

हाँ भला कर तेरा भला होगा,
और दरवेश की सदा क्या है !

जान तुम पर निसार करता हूँ,
मैं नहीं जानता दुआ क्या है !

मैं ने माना कि कुछ नहीं ‘ग़ालिब‘,
मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है !!

– मिर्ज़ा ग़ालिब

 

Sada Hai Fikr-E-Taraqqi Buland-Binon Ko

Sada hai fikr-e-taraqqi buland-binon ko,
Hum aasman se laye hain in zaminon ko.

Padhen durud na kyun dekh kar hasinon ko,
Khayal-e-sanat-e-sane hai pak-binon ko.

Kamal-e-faqr bhi shayan hai pak-binon ko,
Ye khak takht hai hum boriya-nashinon ko.

Lahad mein soye hain chhoda hai shah-nashinon ko,
Qaza kahan se kahan le gayi makinon ko.

Ye jhurriyan nahin hathon pe zoaf-e-piri ne,
Chuna hai jama-e-asli ki aastinon ko.

Laga raha hun mazamin-e-nau ke phir ambar,
Khabar karo mere khirman ke khosha-chinon ko.

Bhala taraddud-e-beja se un mein kya hasil,
Utha chuke hain zamindar jin zaminon ko.

Unhin ko aaj nahin baithne ki ja milti,
Muaf karte the jo log kal zaminon ko.

Ye zairon ko milin sarfaraaziyan warna,
Kahan nasib ki chumen malak jabinon ko.

Sajaya hum ne mazamin ke taza phoolon se,
Basa diya hai in ujdi hui zaminon ko.

Lahad bhi dekhiye in mein nasib ho ki na ho,
Ki khak chhan ke paya hai jin zaminon ko.

Zawal-e-taqat o mu-e-sapid o zof-e-basar,
Inhin se paye bashar maut ke qarinon ko.

Nahin khabar unhen mitti mein apne milne ki,
Zamin mein gaad ke baithe hain jo dafinon ko.

Khabar nahin unhen kya badobast-e-pukhta ki,
Jo ghasb karne lage ghair ki zaminon ko.

Jahan se uth gaye jo log phir nahin milte,
Kahan se dhund ke ab layen ham-nashinon ko.

Nazar mein phirti hai wo tirgi o tanhai,
Lahad ki khak hai surma maal-bainon ko.

Khayal-e-khatir-e-ahbab chahiye har dam,
“Anees” thes na lag jaye aabginon ko. !!

सदा है फ़िक्र-ए-तरक़्क़ी बुलंद-बीनों को,
हम आसमान से लाए हैं इन ज़मीनों को !

पढ़ें दुरूद न क्यूँ देख कर हसीनों को,
ख़याल-ए-सनअत-ए-साने है पाक-बीनों को !

कमाल-ए-फ़क़्र भी शायाँ है पाक-बीनों को,
ये ख़ाक तख़्त है हम बोरिया-नशीनों को !

लहद में सोए हैं छोड़ा है शह-नशीनों को,
क़ज़ा कहाँ से कहाँ ले गई मकीनों को !

ये झुर्रियाँ नहीं हाथों पे ज़ोफ़-ए-पीरी ने,
चुना है जामा-ए-असली की आस्तीनों को !

लगा रहा हूँ मज़ामीन-ए-नौ के फिर अम्बार,
ख़बर करो मिरे ख़िर्मन के ख़ोशा-चीनों को !

भला तरद्दुद-ए-बेजा से उन में क्या हासिल,
उठा चुके हैं ज़मींदार जिन ज़मीनों को !

उन्हीं को आज नहीं बैठने की जा मिलती,
मुआ’फ़ करते थे जो लोग कल ज़मीनों को !

ये ज़ाएरों को मिलीं सरफ़राज़ियाँ वर्ना,
कहाँ नसीब कि चूमें मलक जबीनों को !

सजाया हम ने मज़ामीं के ताज़ा फूलों से,
बसा दिया है इन उजड़ी हुई ज़मीनों को !

लहद भी देखिए इन में नसीब हो कि न हो,
कि ख़ाक छान के पाया है जिन ज़मीनों को !

ज़वाल-ए-ताक़त ओ मू-ए-सपीद ओ ज़ोफ़-ए-बसर,
इन्हीं से पाए बशर मौत के क़रीनों को !

नहीं ख़बर उन्हें मिट्टी में अपने मिलने की,
ज़मीं में गाड़ के बैठे हैं जो दफ़ीनों को !

ख़बर नहीं उन्हें क्या बंदोबस्त-ए-पुख़्ता की,
जो ग़स्ब करने लगे ग़ैर की ज़मीनों को !

जहाँ से उठ गए जो लोग फिर नहीं मिलते,
कहाँ से ढूँड के अब लाएँ हम-नशीनों को !

नज़र में फिरती है वो तीरगी ओ तन्हाई,
लहद की ख़ाक है सुर्मा मआल-बीनों को !

ख़याल-ए-ख़ातिर-ए-अहबाब चाहिए हर दम,
“अनीस” ठेस न लग जाए आबगीनों को !! -Mir Anees Ghazal

 

Ghar Se Ye Soch Ke Nikla Hun Ki Mar Jaana Hai

Ghar se ye soch ke nikla hun ki mar jaana hai,
Ab koi raah dikha de ki kidhar jaana hai.

Jism se saath nibhane ki mat ummid rakho,
Is musafir ko to raste mein thahar jaana hai.

Maut lamhe ki sada zindagi umron ki pukar,
Main yahi soch ke zinda hun ki mar jaana hai.

Nashsha aisa tha ki mai-khane ko duniya samjha,
Hosh aaya to khayal aaya ki ghar jaana hai.

Mere jazbe ki badi qadar hai logon mein magar,
Mere jazbe ko mere sath hi mar jaana hai. !!

घर से ये सोच के निकला हूँ कि मर जाना है,
अब कोई राह दिखा दे कि किधर जाना है !

जिस्म से साथ निभाने की मत उम्मीद रखो,
इस मुसाफिर को तो रास्ते में ठहर जाना है !

मौत लम्हे की सदा ज़िंदगी उम्रों की पुकार,
मैं यही सोच के ज़िंदा हूँ की मर जाना है !

नश्शा ऐसा था की मय-खाने को दुनिया समझा,
होश आया तो ख़याल आया की घर जाना है !

मेरे जज़्बे की बड़ी कद्र हैं लोगों में मगर,
मेरे ज़ज्बें को मेरे साथ ही मर जाना है !! -Rahat Indori Ghazal

 

Dosti Jab Kisi Se Ki Jaye..

Dosti jab kisi se ki jaye,
Dushmanon ki bhi raye lee jaye.

Maut ka zahar hai fizaon mein,
Ab kahan ja ke sans lee jaye.

Bas isi soch mein hun duba hua,
Ye nadi kaise par ki jaye.

Mere mazi ke zakhm bharne lage,
Aaj phir koi bhul ki jaye.

Lafz dharti pe sar payakte hain,
Gumbadon mein sada na di jaye.

Kah do is ahd ke buzurgon se,
Zindagi ki dua na di jaye.

Botalen khol ke to pee barason,
Aaj dil khol ke bhi pee jaye. !!

दोस्ती जब किसी से की जाये,
दुश्मनों की भी राय ली जाए !

मौत का ज़हर हैं फिजाओं में,
अब कहा जा के सांस ली जाए !

बस इसी सोच में हु डूबा हुआ,
ये नदी कैसे पार की जाए !

मेरे माजी के ज़ख्म भरने लगे,
आज फिर कोई भूल की जाए !

लफ़्ज़ धरती पे सर पटकते हैं,
गुम्बदों में सदा न दी जाए !

कह दो इस अहद के बुज़ुर्गों से,
ज़िंदगी की दुआ न दी जाए !

बोतलें खोल के तो पी बरसों,
आज दिल खोल के पी जाए !! -Rahat Indori Ghazal

 

Happy Rose Day Shayari In Hindi

Rose Day SMS Shayari in Hindi_msg

 

Aapke honthon pe sada khilte gulaab rahe
Khuda na kare aap kabhi udas rahe
Hum aapke paas chahe rahe na rahe
Aap jinhe chahe wo sada aapke paas rahe !!

आपके होंटो पे सदा खिलते गुलाब रहे
खुदा ना करे आप कभी उदास रहे
हम आपके पास चाहे रहे ना रहे
आप जिन्हे चाहे वो सदा आपके पास रहे !!

Happy Rose Day SweetHeart

 

Ab Ke Tajdid-E-Wafa Ka Nahi Imkan Jaanan..

Ab ke tajdid-e-wafa ka nahi imkan jaanan,
Yaad kya tujh ko dilayen tera paiman jaanan.

Yunhi mausam ki ada dekh ke yaad aaya hai,
Kis qadar jald badal jate hain insan jaanan.

Zindagi teri ata thi so tere naam ki hai,
Hum ne jaise bhi basar ki tera ehsan jaanan.

Dil ye kahta hai ki shayad hai fasurda tu bhi,
Dil ki kya baat karen dil to hai nadan jaanan.

Awwal awwal ki mohabbat ke nashe yaad to kar,
Be-piye bhi tera chehra tha gulistan jaanan.

Aakhir aakhir to ye aalam hai ki ab hosh nahi,
Rag-e-mina sulag utthi ki rag-e-jaan jaanan.

Muddaton se yahi aalam na tawaqqo na umid,
Dil pukare hi chala jata hai jaanan jaanan.

Hum bhi kya sada the hum ne bhi samajh rakkha tha,
Gham-e-dauran se juda hai gham-e-jaanan jaanan.

Ab ke kuchh aisi saji mehfil-e-yaran jaanan,
Sar-ba-zanu hai koi sar-ba-gareban jaanan.

Har koi apni hi aawaz se kanp uthta hai,
Har koi apne hi saye se hirasan jaanan.

Jis ko dekho wahi zanjir-ba-pa lagta hai,
Shehar ka shahr hua dakhil-e-zindan jaanan.

Ab tera zikr bhi shayad hi ghazal mein aaye,
Aur se aur hue dard ke unwan jaanan.

Hum ki ruthi hui rut ko bhi mana lete the,
Hum ne dekha hi na tha mausam-e-hijran jaanan.

Hosh aaya to sabhi khwab the reza reza,
Jaise udte hue auraq-e-pareshan jaanan. !!

अब के तजदीद-ए-वफ़ा का नहीं इम्काँ जानाँ,
याद क्या तुझ को दिलाएँ तेरा पैमाँ जानाँ !

यूँही मौसम की अदा देख के याद आया है,
किस क़दर जल्द बदल जाते हैं इंसाँ जानाँ !

ज़िंदगी तेरी अता थी सो तेरे नाम की है,
हम ने जैसे भी बसर की तेरा एहसाँ जानाँ !

दिल ये कहता है कि शायद है फ़सुर्दा तू भी,
दिल की क्या बात करें दिल तो है नादाँ जानाँ !

अव्वल अव्वल की मोहब्बत के नशे याद तो कर,
बे-पिए भी तेरा चेहरा था गुलिस्ताँ जानाँ !

आख़िर आख़िर तो ये आलम है कि अब होश नहीं,
रग-ए-मीना सुलग उट्ठी कि रग-ए-जाँ जानाँ !

मुद्दतों से यही आलम न तवक़्क़ो न उमीद,
दिल पुकारे ही चला जाता है जानाँ जानाँ !

हम भी क्या सादा थे हम ने भी समझ रक्खा था,
ग़म-ए-दौराँ से जुदा है ग़म-ए-जानाँ जानाँ !

अब के कुछ ऐसी सजी महफ़िल-ए-याराँ जानाँ,
सर-ब-ज़ानू है कोई सर-ब-गरेबाँ जानाँ !

हर कोई अपनी ही आवाज़ से काँप उठता है,
हर कोई अपने ही साए से हिरासाँ जानाँ !

जिस को देखो वही ज़ंजीर-ब-पा लगता है,
शहर का शहर हुआ दाख़िल-ए-ज़िंदाँ जानाँ !

अब तेरा ज़िक्र भी शायद ही ग़ज़ल में आए,
और से और हुए दर्द के उनवाँ जानाँ !

हम कि रूठी हुई रुत को भी मना लेते थे,
हम ने देखा ही न था मौसम-ए-हिज्राँ जानाँ !

होश आया तो सभी ख़्वाब थे रेज़ा रेज़ा,
जैसे उड़ते हुए औराक़-ए-परेशाँ जानाँ !!

-Ahmad Faraz Ghazal / Urdu Poetry

 

Aaj Phir Ruh Mein Ek Barq Si Lahraati Hai..

Aaj phir ruh mein ek barq si lahraati hai,
Dil ki gahrai se rone ki sada aati hai.

Yun chatakti hain kharabaat mein jaise kaliyan,
Tishnagi saghar-e-labrez se takraati hai.

Shola-e-gham ki lapak aur mera nazuk sa mizaj,
Mujh ko fitrat ke rawayye pe hansi aati hai.

Maut ek amr-e-musallam hai to phir aye saqi,
Ruh kyun zist ke aalam se ghabraati hai.

So bhi ja aye dil-e-majruh bahut raat gayi,
Ab to rah rah ke sitaron ko bhi nind aati hai.

Aur to dil ko nahi hai koi taklif “Adam“,
Han zara nabz kisi waqt thahar jati hai. !!

आज फिर रूह में एक बर्क़ सी लहराती है,
दिल की गहराई से रोने की सदा आती है !

यूँ चटकती हैं ख़राबात में जैसे कलियाँ,
तिश्नगी साग़र-ए-लबरेज़ से टकराती है !

शोला-ए-ग़म की लपक और मेरा नाज़ुक सा मिज़ाज,
मुझ को फ़ितरत के रवय्ये पे हँसी आती है !

मौत एक अम्र-ए-मुसल्लम है तो फिर ऐ साक़ी,
रूह क्यूँ ज़ीस्त के आलाम से घबराती है !

सो भी जा ऐ दिल-ए-मजरूह बहुत रात गई,
अब तो रह रह के सितारों को भी नींद आती है !

और तो दिल को नहीं है कोई तकलीफ़ “अदम“,
हाँ ज़रा नब्ज़ किसी वक़्त ठहर जाती है !!