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2 Line Dua Poetry In Hindi

2 Line Dua Poetry In HIndi

2 Line Dua Poetry In Hindi

2 Line Dua Poetry In Hindi बेहतरीन और चुनिंदा शायरी का संग्रह जो की दुआ शब्द को बहुत ही शानदार तरीके से वर्णित करता है ! दुआ पर हिंदी के ये शेर, आपके प्यार और भावनाओं को वक़्त करने में आपकी मदद कर सकते हैं ! यहाँ आप हर तरह की शायरी को पढ़ सकते है और अपने चाहने वालों को शेरे कर सकते हैं !

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Famous Dua Poetry In Hindi.

Auron ki burai na dekhun wo nazar de,
Haan apni burai ko parakhne ka hunar de.

औरों की बुराई को न देखूँ वो नज़र दे,
हाँ अपनी बुराई को परखने का हुनर दे !

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Main kya karun mere qatil na chahne par bhi,
Tere liye mere dil se dua niklati hai.

मैं क्या करूँ मेरे क़ातिल न चाहने पर भी,
तेरे लिए मेरे दिल से दुआ निकलती है !

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Abhi raah mein kai mod hain koi aayega koi jayega,
Tumein jis ne dil se bhula diya usse bhulne ki dua karo.

अभी राह में कई मोड़ हैं कोई आएगा कोई जायेगा,
तुम्हें जिस ने दिल से भुला दिया उसे भूलने की दुआ करो !

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Aakhir dua karein bhi to kis mudda ke saath,
Kaise zmeen ki baat kahein aasman se hum.

आखिर दुआ करें भी तो किस मुद्दे के साथ,
कैसे ज़मीन की बात कहें आसमान से हम !

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Abhi jinda hai maa meri mujhe kuch bhi nahi hoga,
Main ghar se jab nikalta hun dua bhi saath chalti hain.

अभी ज़िंदा है माँ मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा,
मैं घर से जब निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती हैं !

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Dua ko haath uthate huye larjta hun,
Kabhi dua nahi mangi thi maa ke hote huye.

दुआ को हाथ उठाते हुए लरजता हूँ,
कभी दुआ नहीं मांगी थी माँ के होते हुए !

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Jab bhi kashti meri selaab mein aa jati hai,
Maa dua karti huyi khwaab mein aa jati hai.

जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है,
माँ दुआ करती हुई ख्वाब में आ जाती है !

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Jate ho khuda hafeez haan itni guzarish hai,
Jab yaad hum aa jayein milne ki dua karna.

जाते हो ख़ुदा हाफ़िज़ हाँ इतनी गुज़ारिश है,
जब याद हम आ जाएं मिलने की दुआ करना !

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Kyun mang rahe ho kisi baarish ki duayein,
Tum apne shiksta dar-o-deewar to dekho.

क्यों मांग रहे हो किसी बारिश की दुआएं,
तुम अपने शिकस्ता दर-ओ-दीवार तो देखो !

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Mang lun tujhse tujhi ko ki sabhi kuch mil jaye,
Sau sawalon se yahi ek sawal achcha hai.

मांग लूं तुझसे तुझी को की सभी कुछ मिल जाये,
सौ सवालों से यही एक सवाल अच्छा है !

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Mujhe zindagi ki dua dene wale,
Hansi aa rahi hai teri sadgi par.

मुझे ज़िन्दगी की दुआ देने वाले,
हंसी आ रही है तेरी सादगी पर !

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Koi charaah nahi dua ke siwa,
Koi suna nahi khuda ke siwa.

कोई चराह नहीं दुआ के सिवा,
कोई सुना नहीं खुदा के सिवा !

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Hazar bar jo manga karo kya hasil,
Dua wahi hai jo dil se kabhi nikalti hai.

हज़ार बार जो माँगा करो क्या हासिल,
दुआ वही है जो दिल से कभी निकलती है !

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Dua karo ki ye paudha hara hi lage,
Udasiyon mein bhi chehra khila hi lage.

दुआ करो कि ये पौधा हरा ही लगे,
उदासियों में भी चेहरा खिला ही लगे !

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Dua karo ki main us ke liye dua ho jaun,
Wo ek shakhas jo dil ko dua sa lagta hai.

दुआ करो कि मैं उस के लिए दुआ हो जाऊं,
वो एक शख्स जो दिल को दुआ सा लगता है !

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Mangi thi ek bar dua hum ne maut ki,
Sharminda aaj tak hain miyan zindagi se hum.

मांगी थी एक बार दुआ हम ने मौत की,
शर्मिंदा आज तक हैं मियां ज़िन्दगी से हम !

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Marz-e-ishq jise ho usse kya yaad rahe,
Na dawa yaad rahe aur na dua yaad rahe.

मर्ज़-ए-इश्क़ जिसे हो उससे क्या याद रहे,
न दवा याद रहे और न दुआ याद रहे !

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Maine din raat khuda se ye dua mangi thi,
Koi aahat na ho dar par mere jab tu aaye.

मैंने दिन रात खुदा से ये दुआ मांगी थी,
कोई आहट ना हो दर पर मेरे जब तू आये !

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Dur rahti hain sada un se balayein sahil,
Apne maa-baap ki jo roz dua lete hain.

दूर रहती हैं सदा उन से बलायें साहिल,
अपने माँ-बाप की जो रोज़ दुआ लेते हैं !

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Kisi ne chum ke aankhon ko ye dua di thi,
Zameen teri khuda motiyon se num kar de.

किसी ने चुम के आँखों को ये दुआ दी थी,
ज़मीन तेरी खुदा मोतियों से नुम कर दे !

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Tu salamat raho qayamat tak,
Aur qayamat kabhi na aaye “Shad”.

तू सलामत रहो क़यामत तक,
और क़यामत कभी न आये “शाद” !

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Wo bada rahim o qareem hai mujhe ye sifat bhi ataa kare,
Tujhe bhulne ki dua karun to meri dua mein asar na ho.

वो बड़ा रहीम ओ करीम है मुझे ये सिफ़त भी अता करे,
तुझे भूलने की दुआ करूँ तो मेरी दुआ में असर न हो !

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Ye bastiyan hai ki maqlat dua kiye jaye,
Dua ke din hai musalsal dua kiye jaye.

ये बस्तियां है की मकलत दुआ किये जाये,
दुआ के दिन है मुसलसल दुआ किये जाये !

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Wo sarkhushi de ki zindagi ko sharaab se bahar yaab kar de,
Mere khayalon mein rang bhar mere lahu ko sharaab kar de.

वो सरखुशी दे की ज़िन्दगी को शराब से बाहर याब कर दे,
मेरे ख्यालों में रंग भर मेरे लहू को शराब कर दे !

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Jaban pe shikwa-e-mehri-e-khuda kyun hai,
Dua to mangiye “Aatish” kabhi dua ki tarah.

जबान पे शिकवा-ए-मेहरी-ए-खुदा क्यों है,
दुआ तो मांगिये “आतिश” कभी दुआ की तरह !

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Hijr ki shab nala-e-dil wo sada dene lage,
Sunane wale raat ktne ki dua dene lage.

हिज्र की शब् नाला-ए-दिल वो सदा देने लगे,
सुनने वाले रात कटने की दुआ देने लगे !

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Kya-kya duayein mangte hain sab magar “asar”,
Apni yahi dua hai koi mudda na ho.

क्या-क्या दुआएं मांगते हैं सब मगर “असर”,
अपनी यही दुआ है कोई मुद्दा न हो !

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Sahraa ka safar tha to shajar kyun nahi aaya,
Mangi thi duayein to asar kyun nahi aaya.

सहरा का सफर था तो शजर क्यों नहीं आया,
मांगी थी दुआयें तो असर क्यों नहीं आया !

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Dekh kar tul-e-shab-e-hijr dua karta hun,
Wasl ke roz se bhi umar meri kam ho jaye.

देख कर तूल-ए-शब्-ए-हिज्र दुआ करता हूँ,
वस्ल के रोज़ से भी उम्र मेरी कम हो जाये !

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Raah ka sajar hun main aur ek musafir tu,
De koi dua mujh ko le koi dua mujh se.

राह का सजर हूँ मैं और एक मुसाफिर तू,
दे कोई दुआ मुझ को ले कोई दुआ मुझ से !

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Bhul hi jayein hum ko ye to na ho,
Log mere liye dua na karein.

भूल ही जाएं हम को ये तो न हो,
लोग मेरे लिए दुआ न करें !

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Aate hain barg-o-baar darkhaton ke jism par,
Tum bhi uthao haath ki mausam dua ka hai.

आते हैं बर्ग-ओ-बार दरख़्तों के जिस्म पर,
तुम भी उठाओ हाथ कि मौसम दुआ का है !

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Na charagar ki jrurat na kuch dawa ki hai,
Dua ko haath uthao ki gham ki raat kate.

न चारागर की जरुरत न कुछ दवा की है,
दुआ को हाथ उठाओ की ग़म की रात कटे !

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Dushman-e-jaan hi sahi dost samjata hun usse,
Bad-dua jis ki mujhe ban ke dua lagti hai.

दुश्मन-ए-जाँ ही सही दोस्त समझता हूँ उसे,
बद-दुआ जिस की मुझे बन के दुआ लगती है !

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Kaun deta hai mohabbat ko parstish ka maqam,
Tum ye insaaf se socho to dua do hum ko.

कौन देता है मोहब्बत को परस्तिश का मक़ाम,
तुम ये इन्साफ से सोचो तो दुआ दो हम को !

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Us marz ko marz-e-ishq kaha karte hain,
Na dawa hoti hai jis ki na dua hoti hai.

उस मरज़ को मरज़-ए-इश्क़ कहा करते हैं,
न दवा होती है जिस की न दुआ होती है !

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Zameen ko aye khuda wo jaljala de,
Nishan tak sarhdon ke jo mita de.

ज़मीं को ऐ ख़ुदा वो ज़लज़ला दे,
निशाँ तक सरहदों के जो मिटा दे !

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Ek teri tamana ne kuch yesa nawaza hai,
Mangi hi nahi jati ab koi dua hum se.

एक तेरी तमन्ना ने कुछ ऐसा नवाज़ा है,
माँगी ही नहीं जाती अब कोई दुआ हम से !

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Maut mangi thi khudai to nahi mangi thi,
Le dua kar chuke ab tark-e-dua karte hain.

मौत माँगी थी ख़ुदाई तो नहीं माँगी थी,
ले दुआ कर चुके अब तर्क-ए-दुआ करते हैं !

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Haye koi dawa karo haye koi dua karo,
Haye jigar mein dard hai haye jigar ka kya karun.

हाए कोई दवा करो हाए कोई दुआ करो,
हाए जिगर में दर्द है हाए जिगर का क्या करूँ !

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Us dushman-e-wafa ko dua de raha hun main,
Mera na ho saka wo kisi ka to ho gaya.

उस दुश्मन-ए-वफ़ा को दुआ दे रहा हूँ मैं,
मेरा न हो सका वो किसी का तो हो गया !

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Gham-e-dil ab kisi ke bas ka nahi,
Kya dawa kya dua kare koi.

ग़म-ए-दिल अब किसी के बस का नहीं,
क्या दवा क्या दुआ करे कोई !

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Ye mozja bhi kisi ki dua ka lagta hai
Ye shehar ab bhi usi bewafa ka lagta hai.

ये मोजज़ा भी किसी की दुआ का लगता है,
ये शहर अब भी उसी बे-वफ़ा का लगता है !

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Buland haathon mein zanjir dal dete hain,
Ajib rasm chali hai dua na mange koi.

बुलंद हाथों में जंजीर डाल देते हैं,
अजीब रस्म चली है दुआ ना मांगे कोई !

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Ye iltija dua ye tamana fuzul hai,
Sukhi nadi ke paas samundar na jayega.

ये इल्तिजा दुआ ये तमना फ़ुज़ूल है,
सूखी नदी के पास समुन्दर न जायेगा !

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Koi to phool khilaye dua ke lahze mein,
Ajab trah ki ghutan hai hawa ke lahze mein.

कोई तो फूल खिलाए दुआ के लहज़े में,
अजब तरह की घुटन है हवा के लहज़े में !

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Main zindagi ki dua mangne laga hun bahut,
Jo ho sake to duaon ko be-asar kar de.

मैं ज़िन्दगी की दुआ मांगने लगा हूँ बहुत,
जो हो सके तो दुआओं को बे-असर कर दे !

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Baki hi kya raha tujhe mangne ke baad,
Bas ek dua mein chut gaye dua se hum.

बाकी ही क्या रहा तुझे मांगने के बाद,
बस एक दुआ में छूट गए दुआ से हम !

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Na jane kon si manzil pe ishq aa pahuncha,
Dua bhi kaam na aaye koi dawa na lage.

न जाने कौन सी मंज़िल पे इश्क़ आ पहुंचा,
दुआ भी काम न आये कोई दवा न लगे !

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Manga kareinge ab se dua hijr-e-yaar ki,
Aakhir to dushmani hai asar ko dua ke saath.

माँगा करेंगे अब से दुआ हिज्र-ए-यार की,
आख़िर तो दुश्मनी है असर को दुआ के साथ !

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Duayein yaad kara di gayi thi bachpan mein,
So zakhm khate rahe aur dua diye gaye hum.

दुआएँ याद करा दी गई थीं बचपन में,
सो ज़ख़्म खाते रहे और दुआ दिए गए हम !

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Is liye chal na saka koi bhi khanjar mujh par,
Meri shah-rag pe meri maa ki dua rakkhi thi.

इस लिए चल न सका कोई भी ख़ंजर मुझ पर,
मेरी शह-रग पे मेरी माँ की दुआ रक्खी थी !

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Jab lagen zakhm to qatil ko dua di jaye,
Hai yahi rasm to ye rasm utha di jaye.

जब लगें ज़ख़्म तो क़ातिल को दुआ दी जाए,
है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाए !

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-Dua Shayari / Poetry/ Status / Quotes

 

Dil Ho Kharab Din Pe Jo Kuch Asar Pade

Dil ho kharab din pe jo kuch asar pade,
Ab kar-e-ashiqi to bahar-kaif kar pade.

Ishq-e-butan ka din pe jo kuch asar pade,
Ab to nibahna hai jab ek kaam kar pade.

Mazhab chhudaya ishwa-e-duniya ne shaikh se,
Dekhi jo rail unt se aakhir utar pade.

Betabiyan nasib na thin warna ham-nashin,
Ye kya zarur tha ki unhin par nazar pade.

Behtar yahi hai qasd udhar ka karen na wo,
Aisa na ho ki rah mein dushman ka ghar pade.

Hum chahte hain mel wajud-o-adam mein ho,
Mumkin to hai jo beach mein un ki kamar pade.

Dana wahi hai dil jo kare aap ka khayal,
Bina wahi nazar hai ki jo aap par pade.

Honi na chahiye thi mohabbat magar hui,
Padna na chahiye tha ghazab mein magar pade.

Shaitan ki na man jo rahat-nasib ho,
Allah ko pukar musibat agar pade.

Aye shaikh un buton ki ye chaalakiyan to dekh,
Nikle agar haram se to “Akbar” ke ghar pade. !!

 

Jab Yas Hui To Aahon Ne Sine Se Nikalna Chhod Diya

Jab yas hui to aahon ne sine se nikalna chhod diya,
Ab khushk-mizaj aanhken bhi huin dil ne bhi machalna chhod diya.

Nawak-fagani se zalim ki jangal mein hai ek sannata sa,
Murghan-e-khush-alhan ho gaye chup aahu ne uchhalna chhod diya.

Kyun kibr-o-ghurur is daur pe hai kyun dost falak ko samjha hai,
Gardish se ye apni baz aaya ya rang badalna chhod diya.

Badli wo hawa guzra wo saman wo rah nahi wo log nahi,
Tafrih kahan aur sair kuja ghar se bhi nikalna chhod diya.

Wo soz-o-gudaz us mehfil mein baqi na raha andher hua,
Parwanon ne jalna chhod diya shamon ne pighalna chhod diya.

Har gam pe chand aanhken nigaran har mod pe ek licence-talab,
Us park mein aakhir aye “Akbar” main ne to tahalna chhod diya.

Kya din ko quwwat den ye jawan jab hausla-afzan koi nahi,
Kya hosh sambhaalen ye ladke khud us ne sambhalna chhod diya.

Iqbaal musaid jab na raha rakkhe ye qadam jis manzil mein,
Ashjar se saya dur hua chashmon ne ubalna chhod diya.

Allah ki rah ab tak hai khuli aasar-o-nishan sab qaem hain,
Allah ke bandon ne lekin us rah mein chalna chhod diya.

Jab sar mein hawa-e-taat thi sarsabz shajar ummid ka tha,
Jab sar-sar-e-isyan chalne lagi is ped ne phalna chhod diya.

Us hur-laqa ko ghar laye ho tum ko mubarak aye “Akbar“,
Lekin ye qayamat ki tum ne ghar se jo nikalna chhod diya. !!

 

Jab Bachpan Tha Toh Jawaani Ek Khwaab Tha..

Jab Bachpan Tha Toh Jawaani Ek Khwaab Tha

Jab Bachpan Tha Toh Jawaani Ek Khwaab Tha – Heart Touching Poetry !

Jab Bachpan Tha..
Toh Jawaani Ek Khwaab Tha..
Jab Jawaan Huye..
Toh Bachpan Ek Zamana Tha..

Jab Ghar Mein Rahte The..
Aazadi Achchi Lagti Thi..
Aaj Aazadi Hai..
Phir Bhi Ghar Jane Ki Jaldi Rehti Hai..

Kabhi Hotel Mein Jana..
Pizza, Burger Khaana Pasand Tha..
Aaj Ghar Per Aana..
Aur Maa Ke Haath Ka Khaana Pasand Hai..

School Mein Jinke Saath Jhagarte The..
Aaj Unko Hi Internet Pe Talaashte Hain..

Khushi Kis Mein Hoti Hai..
Ye Pata Ab Chala Hai..
Bachpan Kya tha..
Iska Ehsaas Ab Hua Hai..

Kash Tabdil Kar Sakte Hum Zindagi Ke Kuch Saal..
Kash Ji Sakte Hum..
Zindagi Bharpur Phir Ek Baar..

Jab Apne Shirt Mein Haath Chupate The..
Aur Logon Se Kehte Phirte The..
Dekho..
Maine Apne Haath Jaadu Se Ghayab Kar Diye..

Jab Humare Paas..
Chaar Rangon Se Likhne Wali Ek Qalam Hua Karti Thi..
Aur Hum Sab Ke Button Ko..
Ek Saath Dabane Ki Koshish Kiya Karte The..

Jab Hum Darwaze Ke Piche Chupte The..
Taaki Agar Koi Aaye..
Toh Usse Daraa Sakein..

Jab Aankh Bandh Karke Sone Ka Drama Karte The..
Taaki Koi Humein God Mein Utha Ke..
Bistar Tak Pohncha De..

Socha Karte The..
Ke Ye Chaand Humari Cycle Ke Piche Piche..
Kyun Chal Raha hai..

Wall Switch Ko Darmiyan Mein Atkane Ki..
Koshish Kiya Karte The..

Phal Ke Beej Ko Is Khauf Se Nahi Khate The..
Ke Kahin Humare Pait Mein Darakht Na Ugg Jaye..

Saal Girah Sirf Is Wajah Se Manate The..
Taaki Dhaer Sare Tohfen Milen..

Fridge Aahista Se Bandh Kar Ke..
Ye Janne Ki Koshish Karte The..
Ke Uski Roshni Kab Bandh Hoti Hai..

Sach..
Bachpan Mein Sochte The..
Hum Bade Kyon Nahi Ho rahe..
Aur Ab Sochte Hain..
Hum Bade Kyon Ho Gaye..

Jab Bachpan Tha..
Toh Jawaani Ek Khwaab Tha..
Jab Jawaan Huye..
Toh Bachpan Ek Zamana Tha.. !!

Jab Bachpan Tha Toh Jawaani Ek Khwaab Tha – Heart Touching Poetry In Hindi Language !

जब बचपन था..
तो जवानी एक ख्वाब था..
जब जवान हुए..
तो बचपन एक ज़माना था..

जब घर में रहते थे..
आज़ादी अच्छी लगती थी..
आज आज़ादी है..
फिर भी घर जाने की जल्दी रहती है..

कभी होटल में जाना..
पिज़्ज़ा, बर्गर खाना पसंद था..
आज घर पर आना..
और माँ के हाथ का खाना पसंद है..

स्कूल में जिनके साथ झगड़ते थे..
आज उनको ही इंटरनेट पे तलाशते हैं..

खुशी किस में होती है..
ये पता अब चला है..
बचपन क्या था..
इसका एहसास अब हुआ है..

काश तब्दील कर सकते हम ज़िंदगी के कुछ साल..
काश जी सकते हम..
ज़िन्दगी भरपूर फिर एक बार..

जब अपने शर्ट में हाथ छुपाते थे..
और लोगों से कहते फिरते थे..
देखो..
मैंने अपने हाथ जादू से गायब कर दिए..

जब हमारे पास..
चार रंगों से लिखने वाली एक क़लाम हुआ करती थी..
और हम सब के बटन को..
एक साथ दबाने की कोशिश किया करते थे..

जब हम दरवाज़े के पीछे छुपते थे..
ताकि अगर कोई आये..
तो उससे डरा सकें..

जब आँख बंद करके सोने का ड्रामा करते थे..
ताकि कोई हमें गोद में उठा के..
बिस्तर तक पोहंचा दे..

सोचा करते थे..
के ये चाँद हमारी साइकिल के पीछे पीछे..
क्यों चल रहा है..

वाल स्विच को दरमियाँ में अटकने की..
कोशिश किया करते थे..

फल के बीज को इस खौफ से नहीं खाते थे..
के कहीं हमारे पेट में दरख्त न उग्ग जाये..

साल गिरह सिर्फ इस वजह से मनाते थे..
ताकि ढेर सारे तोहफे मिले..

फ्रिज आहिस्ता से बांध कर के..
ये जानने की कोशिश करते थे..
के उसकी रौशनी कब बांध होती है..

सच..
बचपन में सोचते थे..
हम बड़े क्यों नहीं हो रहे..
और अब सोचते हैं..
हम बड़े क्यों हो गए..

जब बचपन था..
तो जवानी एक ख्वाब था..
जब जवान हुए..
तो बचपन एक ज़माना था.. !!

Childhood Memories / बचपन की यादें शायरी

 

 

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Zid Hai Unhen Pura Mera Arman Na Karenge..

Zid hai unhen pura mera arman na karenge,
Munh se jo nahi nikli hai ab han na karenge.

Kyun zulf ka bosa mujhe lene nahi dete,
Kahte hain ki wallah pareshan na karenge.

Hai zehan mein ek baat tumhaare mutalliq,
Khalwat mein jo puchhoge to pinhan na karenge.

Waiz to banate hain musalman ko kafir,
Afsos ye kafir ko musalman na karenge.

Kyun shukr-guzari ka mujhe shauq hai itna,
Sunta hun wo mujh par koi ehsan na karenge.

Diwana na samjhe hamein wo samjhe sharaabi,
Ab chaak kabhi jeb o gareban na karenge.

Wo jaante hain ghair mere ghar mein hai mehman,
Aayenge to mujh par koi ehsan na karenge. !!

-Akbar Allahabadi Ghazal / Urdu Poetry

 

Ye Aane Wala Zamana Hamein Batayega..

Ye aane wala zamana hamein batayega,
Wo ghar banayega apna ki ghar basayega.

Main sare shehar mein badnaam hun khabar hai mujhe,
Wo mere naam se kya fayeda uthayega.

Phir us ke baad ujale kharidne honge,
Zara si der mein sooraj to dub jayega.

Hai sair-gah ye kachchi munder sanpon ki,
Yahan se kaise koi rasta banega.

Sunai deti nahi ghar ke shor mein dastak,
Main jaanta hun jo aayega laut jayega.

Main soch bhi nahi sakta tha un udanon mein,
Wo apne ganv ki mitti ko bhul jayega.

Hazaron rog to pale hue ho tum “Nazmi“,
Bachane wala kahan tak tumhein bachayega. !!

ये आने वाला ज़माना हमें बताएगा,
वो घर बनाएगा अपना कि घर बसाएगा !

मैं सारे शहर में बदनाम हूँ ख़बर है मुझे,
वो मेरे नाम से क्या फ़ाएदा उठाएगा !

फिर उस के बाद उजाले ख़रीदने होंगे,
ज़रा सी देर में सूरज तो डूब जाएगा !

है सैर-गाह ये कच्ची मुंडेर साँपों की,
यहाँ से कैसे कोई रास्ता बनाएगा !

सुनाई देती नहीं घर के शोर में दस्तक,
मैं जानता हूँ जो आएगा लौट जाएगा !

मैं सोच भी नहीं सकता था उन उड़ानों में,
वो अपने गाँव की मिट्टी को भूल जाएगा !

हज़ारों रोग तो पाले हुए हो तुम “नज़मी“,
बचाने वाला कहाँ तक तुम्हें बचाएगा !!

 

Kab Logon Ne Alfaz Ke Patthar Nahi Phenke

Kab logon ne alfaz ke patthar nahi phenke,
Wo khat bhi magar main ne jala kar nahi phenke.

Thahre hue pani ne ishaara to kiya tha,
Kuch soch ke khud main ne hi patthar nahi phenke.

Ek tanz hai kaliyon ka tabassum bhi magar kyun,
Main ne to kabhi phool masal kar nahi phenke.

Waise to irada nahi tauba-shikani ka,
Lekin abhi tute hue saghar nahi phenke.

Kya baat hai us ne meri taswir ke tukde,
Ghar mein hi chhupa rakkhe hain bahar nahi phenke.

Darwazon ke shishe na badalwaiye “Nazmi“,
Logon ne abhi hath se patthar nahi phenke. !!

कब लोगों ने अल्फ़ाज़ के पत्थर नहीं फेंके,
वो ख़त भी मगर मैं ने जला कर नहीं फेंके !

ठहरे हुए पानी ने इशारा तो किया था,
कुछ सोच के ख़ुद मैं ने ही पत्थर नहीं फेंके !

एक तंज़ है कलियों का तबस्सुम भी मगर क्यूँ,
मैं ने तो कभी फूल मसल कर नहीं फेंके !

वैसे तो इरादा नहीं तौबा-शिकनी का,
लेकिन अभी टूटे हुए साग़र नहीं फेंके !

क्या बात है उस ने मेरी तस्वीर के टुकड़े,
घर में ही छुपा रक्खे हैं बाहर नहीं फेंके !

दरवाज़ों के शीशे न बदलवाइए “नज़मी“,
लोगों ने अभी हाथ से पत्थर नहीं फेंके !!

 

Jo Bhi Mil Jata Hai Ghar Bar Ko De Deta Hun

Jo bhi mil jata hai ghar bar ko de deta hun,
Ya kisi aur talabgar ko de deta hun.

Dhoop ko deta hun tan apna jhulasne ke liye,
Aur saya kisi diwar ko de deta hun.

Jo dua apne liye mangni hoti hai mujhe,
Wo dua bhi kisi gham khwar ko de deta hun.

Mutmain ab bhi agar koi nahi hai na sahi,
Haq to main pahle hi haqdar ko de deta hun.

Jab bhi likhta hun main afsana yahi hota hai,
Apna sab kuch kisi kirdar ko de deta hun.

Khud ko kar deta hun kaghaz ke hawale aksar,
Apna chehra kabhi akhbar ko deta hun.

Meri dukan ki chizen nahi bikti “Nazmi“,
Itni tafsil kharidar ko de deta hun. !!

जो भी मिल जाता है घर बार को दे देता हूँ,
या किसी और तलबगार को दे देता हूँ !

धूप को देता हूँ तन अपना झुलसने के लिए,
और साया किसी दीवार को दे देता हूँ !

जो दुआ अपने लिए माँगनी होती है मुझे,
वो दुआ भी किसी ग़म ख़्वार को दे देता हूँ !

मुतमइन अब भी अगर कोई नहीं है न सही,
हक़ तो मैं पहले ही हक़दार को दे देता हूँ !

जब भी लिखता हूँ मैं अफ़साना यही होता है,
अपना सब कुछ किसी किरदार को दे देता हूँ !

ख़ुद को कर देता हूँ काग़ज़ के हवाले अक्सर,
अपना चेहरा कभी अख़बार को देता हूँ !

मेरी दूकान की चीज़ें नहीं बिकती “नज़मी
इतनी तफ़्सील ख़रीदार को दे देता हूँ !!

 

Ab Nahi Laut Ke Aane Wala

Ab nahi laut ke aane wala,
Ghar khula chhod ke jaane wala.

Ho gayi kuch idhar aisi baatein,
Ruk gaya roz ka aane wala.

Aks aaankhon se chura leta hai,
Ek taswir banane wala.

Lakh honton pe hansi ho lekin,
Khush nahi khush nazar aane wala.

Zad mein tufan ki aaya kaise,
Pyas sahil pe bujhane wala.

Rah gaya hai mera saya ban kar,
Mujh ko khatir mein na lane wala.

Ban gaya ham-safar aakhir “Nazmi”,
Rasta kat ke jaane wala. !!

अब नहीं लौट के आने वाला,
घर खुला छोड़ के जाने वाला !

हो गईं कुछ इधर ऐसी बातें,
रुक गया रोज़ का आने वाला !

अक्स आँखों से चुरा लेता है,
एक तस्वीर बनाने वाला !

लाख होंटों पे हँसी हो लेकिन,
ख़ुश नहीं ख़ुश नज़र आने वाला !

ज़द में तूफ़ान की आया कैसे,
प्यास साहिल पे बुझाने वाला !

रह गया है मेरा साया बन कर,
मुझ को ख़ातिर में न लाने वाला !

बन गया हम-सफ़र आख़िर “नज़्मी”,
रास्ता काट के जाने वाला !!

-Akhtar Nazmi Ghazal / Sad Poetry

 

Aaj Zara Fursat Pai Thi Aaj Use Phir Yaad Kiya

Aaj zara fursat pai thi aaj use phir yaad kiya,
Band gali ke aakhiri ghar ko khol ke phir aabaad kiya,

Khol ke khidki chand hansa phir chand ne donon hathon se,
Rang udaye phool khilaye chidiyon ko aazad kiya.

Bade bade gham khade hue the rasta roke rahon mein,
Chhoti chhoti khushiyon se hi hum ne dil ko shad kiya.

Baat bahut mamuli si thi ulajh gayi takraron mein,
Ek zara si zid ne aakhir donon ko barbaad kiya.

Danaon ki baat na mani kaam aai nadani hi,
Suna hawa ko padha nadi ko mausam ko ustad kiya. !!

आज ज़रा फ़ुर्सत पाई थी आज उसे फिर याद किया,
बंद गली के आख़िरी घर को खोल के फिर आबाद किया !

खोल के खिड़की चाँद हँसा फिर चाँद ने दोनों हाथों से,
रंग उड़ाए फूल खिलाए चिड़ियों को आज़ाद किया !

बड़े बड़े ग़म खड़े हुए थे रस्ता रोके राहों में,
छोटी छोटी ख़ुशियों से ही हम ने दिल को शाद किया !

बात बहुत मामूली सी थी उलझ गई तकरारों में,
एक ज़रा सी ज़िद ने आख़िर दोनों को बरबाद किया !

दानाओं की बात न मानी काम आई नादानी ही,
सुना हवा को पढ़ा नदी को मौसम को उस्ताद किया !!

-Nida Fazli Ghazal / Shayari