Wednesday , February 26 2020
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Juda Shayari

Us ko juda hue bhi zamana bahut hua..

Us ko juda hue bhi zamana bahut hua,
Ab kya kahen ye qissa purana bahut hua.

Dhalti na thi kisi bhi jatan se shab-e-firaq,
Aye marg-e-na-gahan tera aana bahut hua.

Hum khuld se nikal to gaye hain par aye khuda,
Itne se waqiye ka fasana bahut hua.

Ab hum hain aur sare zamane ki dushmani,
Us se zara sa rabt badhana bahut hua.

Ab kyun na zindagi pe mohabbat ko war den,
Is aashiqi mein jaan se jaana bahut hua.

Ab tak to dil ka dil se taaruf na ho saka,
Mana ki us se milna milana bahut hua.

Kya kya na hum kharab hue hain magar ye dil,
Aye yaad-e-yar tera thikana bahut hua.

Kahta tha nasehon se mere munh na aaiyo,
Phir kya tha ek hu ka bahana bahut hua.

Lo phir tere labon pe usi bewafa ka zikr,
Ahmad-“Faraz” tujh se kaha na bahut hua. !!

उस को जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ,
अब क्या कहें ये क़िस्सा पुराना बहुत हुआ !

ढलती न थी किसी भी जतन से शब-ए-फ़िराक़,
ऐ मर्ग-ए-ना-गहाँ तेरा आना बहुत हुआ !

हम ख़ुल्द से निकल तो गए हैं पर ऐ ख़ुदा,
इतने से वाक़िए का फ़साना बहुत हुआ !

अब हम हैं और सारे ज़माने की दुश्मनी,
उस से ज़रा सा रब्त बढ़ाना बहुत हुआ !

अब क्यूँ न ज़िंदगी पे मोहब्बत को वार दें,
इस आशिक़ी में जान से जाना बहुत हुआ !

अब तक तो दिल का दिल से तआरुफ़ न हो सका,
माना कि उस से मिलना मिलाना बहुत हुआ !

क्या क्या न हम ख़राब हुए हैं मगर ये दिल,
ऐ याद-ए-यार तेरा ठिकाना बहुत हुआ !

कहता था नासेहों से मेरे मुँह न आइयो,
फिर क्या था एक हू का बहाना बहुत हुआ !

लो फिर तेरे लबों पे उसी बेवफ़ा का ज़िक्र,
अहमद-“फ़राज़” तुझ से कहा न बहुत हुआ !!

 

Is se pahle ki bewafa ho jayen..

Is se pahle ki be-wafa ho jayen,
Kyun na aye dost hum juda ho jayen.

Tu bhi hire se ban gaya patthar,
Hum bhi kal jaane kya se kya ho jayen.

Tu ki yakta tha be-shumar hua,
Hum bhi tuten to ja-ba-ja ho jayen.

Hum bhi majburiyon ka uzr karen,
Phir kahin aur mubtala ho jayen.

Hum agar manzilen na ban paye,
Manzilon tak ka rasta ho jayen.

Der se soch mein hain parwane,
Rakh ho jayen ya hawa ho jayen.

Ishq bhi khel hai nasibon ka,
Khak ho jayen kimiya ho jayen.

Ab ke gar tu mile to hum tujh se,
Aise lipten teri qaba ho jayen.

Bandagi hum ne chhod di hai “Faraz”,
Kya karen log jab khuda ho jayen. !!

इस से पहले कि बे-वफ़ा हो जाएँ,
क्यूँ न ऐ दोस्त हम जुदा हो जाएँ !

तू भी हीरे से बन गया पत्थर,
हम भी कल जाने क्या से क्या हो जाएँ !

तू कि यकता था बे-शुमार हुआ,
हम भी टूटें तो जा-ब-जा हो जाएँ !

हम भी मजबूरियों का उज़्र करें,
फिर कहीं और मुब्तला हो जाएँ !

हम अगर मंज़िलें न बन पाए,
मंज़िलों तक का रास्ता हो जाएँ !

देर से सोच में हैं परवाने,
राख हो जाएँ या हवा हो जाएँ !

इश्क़ भी खेल है नसीबों का,
ख़ाक हो जाएँ कीमिया हो जाएँ !

अब के गर तू मिले तो हम तुझ से,
ऐसे लिपटें तेरी क़बा हो जाएँ !

बंदगी हम ने छोड़ दी है “फ़राज़”,
क्या करें लोग जब ख़ुदा हो जाएँ !!