Friday , April 10 2020

Dawa Shayari

Dil-E-Nadan Tujhe Hua Kya Hai..

Dil-e-nadan tujhe hua kya hai

 

Dil-e-nadan tujhe hua kya hai,
Aakhir is dard ki dawa kya hai.

Hum hain mushtaq aur wo bezar,
Ya ilahi ye majra kya hai.

Main bhi munh mein zaban rakhta hun,
Kash puchho ki muddaa kya hai.

Jab ki tujh bin nahi koi maujud,
Phir ye hangama aye khuda kya hai.

Ye pari chehra log kaise hain,
Ghamza o ishwa o ada kya hai.

Shikan-e-zulf-e-ambarin kyun hai,
Nigah-e-chashm-e-surma sa kya hai.

Sabza o gul kahan se aaye hain,
Abr kya chiz hai hawa kya hai.

Hum ko un se wafa ki hai ummid,
Jo nahi jaante wafa kya hai.

Han bhala kar tera bhala hoga,
Aur darwesh ki sada kya hai.

Jaan tum par nisar karta hun,
Main nahi jaanta dua kya hai.

Main ne mana ki kuch nahi “Ghalib
Muft hath aaye to bura kya hai. !!

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है,
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है !

हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार,
या इलाही ये माजरा क्या है !

मैं भी मुँह में ज़बान रखता हूँ,
काश पूछो कि मुद्दा क्या है !

जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद,
फिर ये हंगामा ऐ ख़ुदा क्या है !

ये परी-चेहरा लोग कैसे हैं,
ग़म्ज़ा ओ इश्वा ओ अदा क्या है !

शिकन-ए-ज़ुल्फ़-ए-अंबरीं क्यूँ है,
निगह-ए-चश्म-ए-सुरमा सा क्या है !

सब्ज़ा ओ गुल कहाँ से आए हैं,
अब्र क्या चीज़ है हवा क्या है !

हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद,
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है !

हाँ भला कर तेरा भला होगा,
और दरवेश की सदा क्या है !

जान तुम पर निसार करता हूँ,
मैं नहीं जानता दुआ क्या है !

मैं ने माना कि कुछ नहीं ‘ग़ालिब‘,
मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है !!

– मिर्ज़ा ग़ालिब

 

Bimar ko maraz ki dawa deni chahiye..

Bimar ko maraz ki dawa deni chahiye,
Main pina chahta hun pila deni chahiye.

Allah barkaton se nawazega ishq mein,
Hai jitni punji pas laga deni chahiye.

Dil bhi kisi faqir ke hujre se kam nahi,
Duniya yahin pe la ke chhupa deni chahiye.

Main khud bhi karna chahta hun apna samna,
Tujh ko bhi ab naqab utha deni chahiye.

Main phool hun to phool ko gul-dan ho nasib,
Main aag hun to aag bujha deni chahiye.

Main taj hun to taj ko sar par sajayen log,
Main khak hun to khak uda deni chahiye.

Main jabr hun to jabr ki taid band ho,
Main sabr hun to mujh ko dua deni chahiye.

Main khwab hun to khwab se chaunkaiye mujhe,
Main nind hun to nind uda deni chahiye.

Sach baat kaun hai jo sar-e-am kah sake,
Main kah raha hun mujh ko saza deni chahiye. !!

बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए,
मैं पीना चाहता हूँ पिला देनी चाहिए !

अल्लाह बरकतों से नवाज़ेगा इश्क़ में,
है जितनी पूँजी पास लगा देनी चाहिए !

दिल भी किसी फ़क़ीर के हुजरे से कम नहीं,
दुनिया यहीं पे ला के छुपा देनी चाहिए !

मैं ख़ुद भी करना चाहता हूँ अपना सामना,
तुझ को भी अब नक़ाब उठा देनी चाहिए !

मैं फूल हूँ तो फूल को गुल-दान हो नसीब,
मैं आग हूँ तो आग बुझा देनी चाहिए !

मैं ताज हूँ तो ताज को सर पर सजाएँ लोग,
मैं ख़ाक हूँ तो ख़ाक उड़ा देनी चाहिए !

मैं जब्र हूँ तो जब्र की ताईद बंद हो,
मैं सब्र हूँ तो मुझ को दुआ देनी चाहिए !

मैं ख़्वाब हूँ तो ख़्वाब से चौंकाइए मुझे,
मैं नींद हूँ तो नींद उड़ा देनी चाहिए !

सच बात कौन है जो सर-ए-आम कह सके,
मैं कह रहा हूँ मुझ को सज़ा देनी चाहिए !!